कम बोलो, धीरे बोलो, मीठा बोलो            सोच के बोलो, समझ के बोलो, सत्य बोलो            स्वमान में रहो, सम्मान दो             निमित्त बनो, निर्मान बनो, निर्मल बोलो             निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनो      शुभ सोचो, शुभ बोलो, शुभ करो, शुभ संकल्प रखो          न दुःख दो , न दुःख लो          शुक्रिया बाबा शुक्रिया, आपका लाख लाख पद्मगुना शुक्रिया !!! 

Synopsis of the Avyakt Murli of November 26, 1979 ( April 26, 2015)


Synopsis November 26, 1979

Fulfilling the responsibility of love (Preet ki Reet)

Become world benefactors to uplift the world.


The total return of love is to become equal to the father, subtle residents of the subtle region and masters of all virtues, the same as the incorporeal Father. Practise having the karmateet stage that you will have during the extreme situations of the final moments. When you experience your stage of the final moments, of the extreme times, you will be able to pass with honours at the end.


Alokik Birth: 

This divine birth is not bondage: it is a relationship. This is not a birth in which you have any bondage of karma, but a birth in which you become a karma yogi. In this alokik divine birth, you Brahmin souls are independent, not dependent.


Be beyond the awareness of the body: 

Baba says: You can only become free if you let go! Practise remaining aware that you are a trustee and are free from all bondage. Change from being one who feels bound by your karma and become a karma yogi. Become regular and punctual in following the Father's direction to become a constant and easy yogi. Free yourself from all bondage. When you consider yourself to have all your relationships with the one Father alone, you will be constantly ever ready.

You have already shed your body and died alive. You have simply adopted that old body to serve the world. The Father is filling that old body with power and making it move along. It is the Father's responsibility. Let go of the consciousness of "mine"! This is a royal form of Maya. Conquer this Maya and you can become a conqueror of matter within a second. You will then take the support of matter, but you will not be dependent on it. Only those who have conquered matter can conquer the world (prakriti jeet so jagat jeet). Challenge situations and show them that you are mahavirs.


Practise becoming bodiless as soon as you have that thought:

You Brahmin souls, who have died alive and are great souls, are able to enter and leave your own bodies. Become a karma yogi whenever you choose, become a yogi of the supreme abode or a yogi of the subtle region whenever you wish. Since you have become the masters of the three worlds (trilokinath), you are free to do this whenever you want.

No matter how busy you are in service or how much your work is pulling you, or even if your intellect is very busy in this work, at such a time, practise becoming bodiless. When your service is accurate, there can never be any bondage of that service, because a yogyukt and yuktiyukt server constantly stays beyond whilst serving. It shouldn't be that, because you have a lot of service to do, you are unable to become bodiless.
If you remember that it is not your service, but that the Father has given it to you, you will remain free from bondage. Then, you will easily and automatically be able to become bodiless in a second.


Trusteeship: 

Renounce everything including your body. The first promise that all of you made was: "Body, mind and wealth are all no longer mine, but Yours." Since they are not your own, and they belong to Baba, how can you be bound to them? BapDada has just given them to you on loan. You are just the trustee of it all, not the owner.

If you remain free by staying aware that you have received that body on loan, you can then fly within a second. You are free and the One who is making you move is doing that; you are just moving.
Constantly remember your fortune and the Bestower who has bestowed that fortune on you. BapDada constantly says: Young children are like God; they are equal to God.


Service:

(1)   Let the Father's virtues be visible through each one's face. Let whoever comes into contact with you experience bliss, love and happiness.

(2)      Those who constantly have one Support are able to remain constant and stable. Such souls are constant lighthouses and move along while free from obstacles. They become instruments to show the path to many others. This is the duty, business and activity of Brahmins.


Blessing: May you be seated on BapDada's heart-throne and forget your old body and the world.

The place for the elevated confluence-aged souls is BapDada's heart throne. You cannot receive such a throne throughout the whole cycle. You will of course continue to receive a throne for the kingdom of the world or the kingdom of a state, but you will not find this throne. This is such an unlimited throne that you can do whatever you want — walk, tour around, eat, sleep — and still be on the throne. The children who are always seated on BapDada's heart throne have forgotten their old bodies and the bodily world. They see it but do not see it.

Slogan: To race after limited name, honour and pride means to chase after a shadow.

26-04-15 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज:26-11-79 मधुबन


26-04-15 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज:26-11-79 मधुबन

 

प्रीत की रीति

बापदादा सर्व बच्चों की याद और प्यार का रिटर्न देने के लिए बच्चों के समान साकार रूप में आते हैं क्योंकि समान बनना ही स्नेह का रिटर्न है। बाप बच्चों के सदा स्नेही और सदा के आज्ञाकारी हैं। बच्चे बुलाते हैं और बाप आ जाते हैंसमान बन जाते हैं। बाप परकाया प्रवेश होकर भी प्रीत की रीति निभाने आ जाते हैं। अब बच्चों को क्या करना हैवैसे तो सब बच्चे स्नेही हैंमधुबन निवासी बनना ही स्नेह का रिटर्न है। दूर-दूर से भाग आनायह भी स्नेह है। सम्पूर्ण स्नेह का रिटर्न क्या हैस्नेही तो हो। साथ-साथ बाप का भी स्नेह है। सदा एक संकल्प है कि सर्व बच्चे बाप समान बन जाएं। जैसे बाप आप सबके समानस्नेह के कारणसाकार वतन निवासीसाकार रूपधारी बन जाते हैं वैसे आप सब बाप-समान आकारी अव्यक्त वतन निवासी बनो या निराकारी बाप के गुणों समान सर्व गुणों में भी मास्टर बन जाओ- इसको कहा जाता है सम्पूर्ण स्नेह का रिटर्न। ऐसे सम्पूर्ण स्नेह का रिटर्न देने वाले बने हो या बनना हैबने जरूर हो लेकिन नम्बरवार। आज बापदादा सर्व स्नेही बच्चों का खेल देख रहे थे। क्या खेल होगाखेल देखना तो आपको भी अच्छा लगता है। क्या देखाअमृतवेले का समय था। हरेक आत्माजो पक्षी समान उड़ने वाली है अथवा रॉकेट की गति से भी तेज़ उड़ने वाली हैआवाज़ की गति से भी तेज़ जाने वाली हैसब अपने-अपने साकार स्थानों परजैसे प्लेन एरोड्रोम पर आ जाते हैं वैसे सब अपने रूहानी एरोड्रोम पर पहुँच गये। लक्ष्य और डायरेक्शन सबका एक ही था। लक्ष्य था उड़कर बाप समान बनने का और डायरेक्शन था एक सेकेण्ड में उड़ने का। क्या हुआजैसे साइन्स के साधन एरोप्लेन जब उड़ते हैं तो पहले चेकिंग होती है फिर माल भरना होता है। जो भी उसमें चाहिए - जैसे पेट्रोल चाहिएहवा चाहिएखाना चाहिएजो भी चाहिएउसके बाद धरती को छोड़ना होता है फिर उड़ना होता है। ब्राह्मण आत्मा रूपी विमान भी अपने स्थान पर तो आ ही गये। लेकिन जो डायरेक्शन था अथवा है एक सेकेण्ड में उड़ने काउसमें कोई चेकिंग करने में रह गये। मैं आत्मा हूँशरीर नहीं हूँ - इसी चेकिंग में रह गये और कोई ज्ञान के मनन द्वारा स्वयं को शक्तियों से सम्पन्न बनाने में रह गये। मैं मास्टर ज्ञानस्वरूप हूँमैं मास्टर सर्वशक्तिमान हूँ - इस शुद्ध संकल्प तक रहेलेकिन स्वरूप नहीं बन पाये। तो दूसरी स्टेज भरने तक रह गये और कोई फिर भरने में बिज़ी होने के कारण उड़ने से रह गये क्योंकि शुद्ध संकल्प में तो रमण कर रहे थे लेकिन यह देह रूपी धरती को छोड़ नहीं सकते थे। अशरीरी स्टेज पर स्थित नहीं हो पाते थे। बहुत चुने हुए थोड़े से बाप के डायरेक्शन प्रमाण सेकेण्ड में उड़कर सूक्ष्मवतन या मूलवतन में पहुँचे। जैसे बाप प्रवेश होते हैं और चले जाते हैंतो जैसे परमात्मा प्रवेश होने योग्य है वैसे मरजीवा जन्मधारी ब्राह्मण आत्मायें अर्थात् महान आत्मायें भी प्रवेश होने योग्य हैं। जब चाहो कर्मयोगी बनोजब चाहो परमधाम निवासी योगी बनोजब चाहो सूक्ष्मवतन वासी योगी बनो। स्वतंत्र हो। तीनों लोकों के मालिक हो। इस समय त्रिलोकीनाथ हो। तो नाथ अपने स्थान पर जब चाहें तब जा सकते हैं।

कई बच्चों का एक संकल्प पहुँचता है कि बाप तो निर्बन्धन हैं और हमें तो देह का बन्धन हैकर्म का बन्धन है। लेकिन बाप-दादा यह क्वेश्चन पूछते हैं अब तक क्या देह सहित त्याग नहीं किया हैपहला-पहला वायदा है सब बच्चों का कि तन-मन-धन तेरा न कि मेरा। जब तेरा हैमेरा है ही नहीं तो फिर बन्धन काहे कायह तो लोन पर बाप-दादा ने दिया है। आप ट्रस्टी होन कि मालिक। जब मरजीवा बन गये तो 83 जन्मों का हिसाब समाप्त हो गया। अब यह नया 84 वाँ जन्म है। इस जन्म की तुलना और जन्मों से कर ही नहीं सकते हो। इस दिव्य जन्म का बन्धन नहींसम्बन्ध है। कर्मबन्धनी जन्म नहींयह कर्मयोगी जन्म है। इस अलौकिक दिव्य जन्म में ब्राह्मण आत्मा स्वतंत्र है न कि परतत्र। तेरे को मेरे में लाते हो तब परतत्र होते हो। मेरा पहला हिसाबमेरा पहला संस्कार आया कहाँ सेअगर ऐसे स्वतंत्र होकर रहो कि यह लोन मिली हुई देह है तो सेकेण्ड में उड़ सकते हो। जो वायदे करते हो कि जहाँ बिठायेंगे वहाँ बैठेंगेजो कहेंगे वह करेंगे। तो बाप की बन्धनी आत्मा हो या कर्म-बन्धनी आत्मा होयह भी बाप ने डायरेक्शन दिया है कि कर्म करो। आप स्वतंत्र होचलाने वाला चला रहा हैआप चल रहे हो। आपकी सरस्वती माँ की यह विशेष धारणा थी ‘हुक्मी हुक्म चला रहा हैतब नम्बर आगे ले लिया। फॉलो फादर और मदर।

कर्मभोग है’, ‘कर्मबन्धन है’,‘संस्कारों का बन्धन है’, ‘संगठन का बन्धन है’ - इस व्यर्थ संकल्प रूपी जाल को अपने आप ही इमर्ज करते हो और अपने ही जाल में स्वयं फँस जाते होफिर कहते हो कि अभी छुड़ाओ। बाप कहते हैं कि तुम हो ही छूटे हुए। छोड़ो तो छूटो। अब निर्बन्धनी हो या बन्धनी हो?पहले ही शरीर छोड़ चुके होमरजीवा बन चुके हो। यह तो सिर्फ विश्व की सेवा के लिए शरीर रहा हुआ हैपुराने शरीरों में बाप शक्ति भर कर चला रहे हैं। जिम्मेवारी बाप की हैफिर आप क्यों ले लेते हो?ज़िम्मेवारी सम्भाल भी नहीं सकते हो लेकिन छोड़ते भी नहीं हो। ज़िम्मेवारी छोड़ दो अर्थात् मेरा-पन छोड़ दो। मेरा पुरूषार्थमेरी इन्वेन्शनमेरी सर्विसमेरी टचिंगमेरे गुण बहुत अच्छे हैंमेरी हैन्डलिंग-पॉवर बहुत अच्छी है। मेरी निर्णय शक्ति बहुत अच्छी है। मेरी समझ ही यथार्थ है। बाकी सब मिसअन्डरस्टैन्डिंग में हैं। यह मेरा-मेरा आया कहाँ सेयही रॉयल माया हैइससे मायाजीत बन जाओ तो सेकेण्ड में प्रकृति जीत बन जायेंगे। प्रकृति का आधार लेंगे लेकिन अधीन नहीं बनेंगे। प्रकृतिजीत ही विश्व जीत व जगतजीत हैं। फिर एक सेकेण्ड का डायरेक्शन अशरीरी भव का सहज और स्वतः हो जायेगा। खेल क्या देखातेरे को मेरे बनाने में बड़े होशियार हैं। जैसे जादू मत्र से जो कोई कार्य करते हैं तो पता नहीं पड़ता कि हम क्या कर रहे हैं। यह रॉयल माया भी जादू-मत्र कर देती है जो पता ही नहीं पड़ता कि हम क्या कह रहे हैं। अब क्या करेंगेअब कर्मबन्धनी से कर्म योगी समझो। अनेक बन्धनों से मुक्त एक बाप के सम्बन्ध में समझो तो सदा एवर-रेडी रहेंगे। संकल्प किया और अशरीरी बनायह प्रैक्टिस करो। कितना भी सेवा में बिज़ी होकार्य की चारों ओर की खींचातान होबुद्धि सेवा के कार्य में अति बिज़ी हो - ऐसे टाइम पर अशरीरी बनने का अभ्यास करके देखो। यथार्थ सेवा का कभी बन्धन होता ही नही क्योंकि योग युक्तयुक्ति युक्त सेवाधारी सदा सेवा करते भी उपराम रहते हैं। ऐसे नहीं कि सेवा ज्यादा है इसलिए अशरीरी नहीं बन सकते। याद रखो मेरी सेवा नहीं बाप ने दी है तो निर्बन्धन रहेंगे। ‘ट्रस्टी हूँबन्धन मुक्त हूँ’ ऐसी प्रैक्टिस करो। अति के समय अन्त की स्टेज,कर्मातीत अवस्था का अभ्यास करो तब कहेंगे तेरे को मेरे में नहीं लाया है। अमानत में ख्यानात नहीं की है समझाअभी का अभ्यास क्या करना हैजैसे बीच-बीच में संकल्पों की ट्रैफिक का कन्ट्रोल करते हो वैसे अति के समय अन्त की स्टेज का अनुभव करो तब अन्त के समय पास विद आनर बन सकेंगे।

 

ऐसे सदा बन्धन मुक्तबाप-समान जब चाहें प्रकृतिजीतसंकल्प और संस्कार में भी ट्रस्टी सदा देह की स्मृति से भी उपरामऐसे विश्व-उपकारी विश्व-कल्याणकारी बच्चों को बाप-दादा का यादप्यार और नमस्ते।

 

पार्टियों के साथ अव्यक्त बाप-दादा की मुलाकातः- (बाम्बे और पूना ज़ोन)

 

1) सदा अपने मस्तक पर भाग्य का सितारा चमकता हुआ दिखाई देता है? या सितारे की चमक के आगे कभी-कभी माया के बादल भी आ जाते हैंअगर बादल होते हैं तो सितारे छिप जाते हैं और बादल नहीं होते तो बहुत सुन्दर चमकते रहते हैं। ऐसे आपके भाग्य का सितारा सदा चमकता है या बादल आ जाते हैंब्राह्मण बने और सितारा चमकालेकिन सितारे के आगे बादल न आएं। सितारे की चमक छिपने न देंयह है अटेन्शन। जैसे फोटो निकालते हैंअगर बादल आगे आ जाएं तो फोटो ठीक निकलेगाफीचर्स ही नहीं दिखाई देंगेऐसे ही अगर चमकते हुए सितारे के आगे बादल आ जाएं तो साक्षात्कार कैसे करायेंगे। आप तो बाप को प्रत्यक्ष कराने वाले अर्थात् स्वयं द्वारा बाप का साक्षात्कार कराने वाले हो। बादलों के बीच से कैसे साक्षात्कार होगातो साक्षात्कार कब करायेंगेक्या जब विनाश होगा तबअभी ही ऐसा बनना पड़ेगा। अगर बहुत समय का बादलों को दूर करने का अभ्यास नहीं होगा तो बादल भी उसी समय लास्ट घड़ी आयेंगे। साक्षात्कार के लिए खड़े हों और बादल आ जाएं तो सारा प्रोग्राम ही अपसेट हो जायेगा। अब ऐसे अभ्यासी बनो जो दूर से ही बादल भाग जाएं। जैसे साइन्स के साधन तूफान कोपहाड़ों के रास्ते को चेन्ज कर सकते हैं ना। वह साइन्स तो अपूर्ण है। साइन्स कभी सम्पूर्ण हो नहीं सकती क्योंकि मनुष्य-मत है। कभी नीचे कभी ऊपर होती रहती है। तो अनलॉफुल हो गई ना। बाप की श्रीमत पर चलने वाले तो जो चाहें वह कर सकते हैं। तो विघ्नों को दूर करने का बहुत समय का अभ्यास चाहिए। पुरुषार्थ तो सब कर रहे हो लेकिन पुरूषार्थ की स्पीड कौन-सी हैकाम हो एक सेकेण्ड का आप करो दो घंटे मेंतो टाइम तो पूरा हो जायेगा ना। प्रश्नों का उत्तर ठीक दे लेकिन टाइम पर न देतो पास होंगे या फेलचल रहे हैंकर रहे हैं इससे अभी काम नहीं चलेगा। इसमें भी खुश हो जाना कि रोज़ क्लास तो करते हैंरेगुलर पन्क्चुअल हैंसेवा भी करते हैं लेकिन जो बाप का डायरेक्शन है - निरन्तर योगीसहजयोगी - उसमें रेगुलर और पन्क्चुअल बनो। बाप के पास वह प्रेजेन्ट मार्क पड़ेगी ना। उसकी भी मार्क्स मिलती हैं लेकिन नम्बर आगे तो इसी प्रजेन्ट मार्क से बनेंगे। कौन-सी माला में आने वाले होअगर कभी-कभी इसी स्थिति में स्थित रहते हो तो कभी-कभी पूजने वाली माला में आयेंगेपीछे का मणका बनेंगे। माताएं कौन-सी सेवा करेंगीसब नम्बर वन जायेंगीनम्बर वन ग्रुप बनेगा। जितना सर्विस करो उतना ही लाख गुणापदम गुणा होकर मिलेगा इसलिए यह संगमयुग है करने और पाने का। अभी-अभी करनाअभी-अभी पाना। प्रवृत्ति में रहते भी डबल सेवा करोतो हैन्डस भी बन जायेंगे और सेन्टर भी खुल जायेंगे। सरेन्डर हैन्डस तो कम ही हैंवह चक्कर लगाते रहें लेकिन सम्भालने वाले प्रवृत्ति वाले होंऐसे भी सेन्टर खुल सकते हैं। अगर बच्चों कागृहस्थी का झंझट है तो कमरा अलग लेकर सम्भालो। अगर बच्चों आदि की खिट-खिट नहीं हैकोई विघ्न-रूप नहीं हैं तो घर में भी सेन्टर सम्भालो।

2- सदा अचल-अडोल रहते हो? कल्प पहले भी रावण सेना ने हिलाने की कोशिश की लेकिन अंगद अचल रहे। परिस्थितियाँ आयेंगी और चली जायेंगीस्वस्थिति सदा आगे बढ़ायेगी। परिस्थिति के पीछे भागने से स्वस्थिति चली जायेगी। कोई भी परिस्थिति आये तो आप हाई जम्प दोइससे पार हो जायेंगे। परिस्थिति आना भी गुड-लक है। यह पेपर फाउन्डेशन को मज़बूत करने का साधन है। यह निश्चय को हिलाकर देखने के लिए आते हैं। एक बारी अंगद समान मज़बूत हो जायेंगे तो यह नमस्कार करेंगे। पहले विकराल रूप से आयेंगे और फिर दासी रूप से आयेंगे। चैलेन्ज करो हम महावीर हैं। पानी के ऊपर लकीर ठहरती है क्याआप मास्टर ज्ञान सागर के उपर कोई परिस्थिति वार कर नहीं सकती। लकीर डाल नहीं सकती।

3- सदा ‘एक बल एक भरोसा’ इसी लगन में रहते हो? जो सदा एक भरोसे में रहे हैं वही सदा एकरस रहते हैं। और कोई भी रस ऐसी आत्माओं को आकर्षित नहीं कर सकता। ऐसी आत्मायें सदा स्वयं भी लाइट हाउस बन निर्विघ्न होकर चलती हैं और अनेकों के निमित्त रास्ता दिखाने वाली बनती हैं। तो रोज़ कितनी आत्माओं को लाइट हाउस बनकर रासता दिखाते होयही ब्राह्मणों का कर्तव्य हैयही धन्धा अथवा व्यवहार है।

4- अनुभवी मूर्त के द्वारा बाप की सूरत की प्रत्यक्षता- सदा बाप के गुणों में अनुभवी मूर्त हो? जो बाप के गुण गाते हो उन सबके अनुभवी हो नाआनन्द का सागर बाप है तो उसी आनन्द के सागर की लहरों में लहराने वाले अनुभवी मूर्त। जो सदा सर्व गुणों के अनुभवी हैं ऐसे अनुभवी मूर्त द्वारा बाप की सूरत प्रत्यक्ष होती है। आप सब बाप को प्रत्यक्ष करने वाले हो। इतने महान हो जो परम आत्मा को भी प्रत्यक्ष करने वाले हो। हरेक की सूरत से बाप के गुण दिखाई दें। जो भी सम्पर्क में आये उसे आनन्द,प्रेमसुख सब गुणों की अनुभूति हो।

5- पीछे आने वालों का भाग्य भी कम नहींबहुत श्रेष्ठ है - कैसे? पीछे आने वाले बनी बनाई पर आये हैं। जैसे दादे परदादे बीज डालते हैं और पौत्रे धोत्रे खाते हैं। तो पीछे आने वाले फल खाने वाले हैं। अभी कितने अच्छे साधनकितने अच्छे स्थान बने बनाये मिले हैं। मंथन करने वाले दूसरे हैं आप मक्खन खाने वाले हो इसलिए सदा खुश हो। सदा अपने भाग्य को और देने वाले दाता को याद रखो। बापदादा सदा कहते हैं छोटे सुभानअल्ला होते हैं अर्थात् समान अल्लाह।

 

 

वरदान:- पुरानी देह और दुनिया को भूलने वाले बापदादा के दिलतख्तनशीन भव ! 

 

संगमयुगी श्रेष्ठ आत्माओं का स्थान है ही बापदादा का दिलतख्त। ऐसा तख्त सारे कल्प में नहीं मिल सकता। विश्व के राज्य का वा स्टेट के राज्य का तख्त तो मिलता रहेगा लेकिन यह तख्त नहीं मिलेगा-यह इतना विशाल तख्त है जो चलोफिरोखाओ-सोओ लेकिन सदा तख्तनशीन रह सकते हो। जो बच्चे सदा बापदादा के दिलतख्तनशीन रहते हैं वे इस पुरानी देह वा देह की दुनिया से विस्मृत रहते हैंइसे देखते हुए भी नहीं देखते।

 

स्लोगन:- हद के नाममानशान के पीछे दौड़ लगाना अर्थात् परछाई के पीछे पड़ना।

 

Avyakt Murli: April 26, 2015 Revised from: November 26, 1979




Avyakt Murli: April 26, 2015

Revised from: November 26, 1979


Fulfilling the responsibility of love (Preet ki Reet)

In order to give all of you children the return of your love and remembrance, BapDada has become corporeal in the same way as you, because to become equal means to give the return of love. The Father constantly loves His children and always obeys them. As soon as His children call Him, He comes here and becomes the same as them. The Father enters another soul's body in order to fulfil His responsibility of love. So, what should you children now be doing? All of you children are loving anyway. In fact, to live in Madhuban is also to give the return of love. To come running here from far away is also a sign of love. What is the return of having total love? You are loving and you also have the Father's love. The one thing that the Father constantly desires is that all of His children should become equal to Him. Because of His love for you, He becomes equal to all of you by coming into the corporeal world and adopting a corporeal form. So, all of you should also become equal to the father, subtle residents of the subtle region and masters of all virtues, the same as the incorporeal Father. This is known as the return of love. Have you become those who give the return of total love? Or, do you still have to become that? You have definitely become that, but you are numberwise! Today, BapDada was watching the games of all the loving children. What games were being played? You also enjoy watching games, do you not? What was seen at the time of the early morning hours of nectar? All of you souls who can fly like birds who can fly even faster than a rocket, and those who move even faster than the speed of sound, reached your corporeal places. Just as when an aeroplane reaches its destination, it lands at that airport, so too, all of you souls reached your spiritual airport. The aim and direction of each of you was the same. Your aim was to fly and become equal to the Father and the direction was to fly within a second. So, what happened? Before an aeroplane takes off, checking is done with the facilities of science to ensure everything is in order and then it is loaded with everything. The plane has to be filled with whatever is needed, such as petrol, air and food; only then would the plane take off and fly. All the aeroplanes of you Brahmin souls did reach your take-off point. However, the direction was and is to fly within a second. Many were left behind, because they were still doing their checking. Some were left behind because of checking: "I am a soul, not a body." Some were left behind whilst trying to fill themselves with all powers by churning knowledge: "I am a master embodiment of knowledge. I am a master almighty authority". Some had these pure thoughts, but they were unable to become embodiments of them, and so they got stuck in the second stage of just filling themselves. Some remained so busy in trying to fill themselves that they were unable to fly. They were engaged in pure thoughts, but they were unable to leave the earth of the body; they were unable to stabilise in the bodiless stage. A very few select ones were able to fly within a second and reach the subtle world or the incorporeal world according to the Father's direction. Just as the Father enters another body and then leaves; just as the Supreme Soul is able to enter another one's body, so, you Brahmin souls, who have died alive and are great souls, are also able to enter and leave your own bodies. Become a karma yogi whenever you choose, become a yogi of the supreme abode or a yogi of the subtle region whenever you wish. Since you have become the masters of the three worlds, you are free to do this whenever you want. At this time, you are lords of all three worlds and a lord is able to go to his place whenever he wants. One thought of many children reaches Baba. They think: "The Father is free from bondage, whereas I am bound in the bondage of the body and the bondage of karma". However, BapDada is still asking you: Have you not yet renounced everything including your body? The first promise that all of you children made was: "Body, mind and wealth are all no longer mine, but Yours." Since they are not your own, and they belong to Baba, how can you be bound to them? BapDada has just given them to you on loan. You are just the trustee of it all, not the owner. Now that you have died alive and your accounts of 83 births have been completed, this is your new, 84th birth. You cannot compare this birth to any other birth. This divine birth is not a bondage: it is a relationship. This is not a birth in which you have any bondage of karma, but a birth in which you become a karma yogi. In this alokik divine birth, you Brahmin souls are independent, not dependent. It is when you change "Yours" into "mine" that you become dependent. "My first account, my first sanskars." Where did this "mine" come from? If you remain free by staying aware that you have received that body on loan, you can then fly within a second. You promised that you would sit wherever you were made to sit, and do whatever you were told to do. So, are you a soul who is in bondage to the Father or in bondage to karma? The Father has also given you the direction to perform karma. You are free and the One who is making you move is doing that; you are just moving. This was the special dharna of your mother Saraswati: "The One who is giving all the orders is making me move." This was how she claimed a number ahead. So, follow the mother and father. You allow a web of wasteful thoughts to enter your mind in the form of: "I have to settle my karma, I am bound by my karma, I am bound by my sanskars, and I am also in bondage to the gathering." You trap yourself in the web you create, and you then ask to be released! Baba says: You are already free, but you can only become free if you let go! Are you free from bondage or in bondage? You have already shed your body and died alive. You have simply adopted that old body to serve the world. The Father is filling that old body with power and making it move along. It is the Father's responsibility, so why do you take it upon yourself? You do not look after your responsibility and yet you do not let go of it! Let go of the responsibility, that is, let go of the consciousness of "mine"! "My effort, my invention, my service, my touchings, my virtues etc. are very good! My handling power is very good! My decision-making power is very good! My understanding is accurate, whereas everyone else is under a misunderstanding." Where did this consciousness of "mine" come from? This is a royal form of Maya. Conquer this Maya and you can become a conqueror of matter within a second. You will then take the support of matter, but you will not be dependent on it. Only those who have conquered matter can conquer the world. Then, you will easily and automatically be able to follow the direction of becoming bodiless in a second. What game did you see? You are all very clever in making "mine" into "Yours". If someone does something whilst under a magic spell, he is not even aware of what he is doing. This royal Maya also casts a magic spell and you don't realise what you are saying. What will you do now? Now change from being one who feels bound by your karma and become a karma yogi. Do you understand? Now, free yourself from all bondage. When you consider yourself to have all your relationships with the one Father alone, you will be constantly ever ready. Practise becoming bodiless as soon as you have that thought. No matter how busy you are in service or how much your work is pulling you, or even if your intellect is very busy in this work, at such a time, practise becoming bodiless. When your service is accurate, there can never be any bondage of that service, because a yogyukt and yuktiyukt server constantly stays beyond whilst serving. It shouldn't be that, because you have a lot of service to do, you are unable to become bodiless. If you remember that it is not your service, but that the Father has given it to you, you will remain free from bondage. Practise remaining aware that you are a trustee and are free from all bondage. Practise having the karmateet stage that you will have during the extreme situations of the final moments; only then would it be said that you haven't changed "Yours" into "mine", that you haven't been dishonest with the treasures entrusted to you. Do you understand what you now have to practise? Just as you have traffic control of your thoughts every now and then, so also experience your stage of the final moments, of the extreme times. Then, at the end, you will be able to pass with honours.

To those who are constantly free from bondage, to those who are like the Father and can conquer matter whenever they want, to those who are constant trustees of their natures and sanskars, to those who are beyond the awareness of the body; to such children who are the world benefactors to uplift the world, BapDada's love, remembrance and namaste.


BapDada meeting the Bombay and Poona Zones:

1. Is your star of fortune constantly visible sparkling on your forehead? Or do the clouds of Maya sometimes come in front of the star?

When there are clouds, the stars get hidden, and when there are no clouds, the stars continue to sparkle beautifully. Is your star of fortune constantly sparkling in the same way, or do clouds come in front of it? As soon as you become a Brahmin, your star begins to sparkle, but you have to make sure that no clouds come in front of the star. You have to pay attention and see that the sparkle of your star doesn't get hidden. When photographs are being taken, if clouds appear, the photo won't be so good; the features won't be clear. So, too, if clouds appear in front of you sparkling stars, how would you be able to grant visions? You are those who will reveal the Father, that is, you will give a vision of the Father through yourself. How can a vision be seen through clouds? So, when will you grant visions? Will it be when destruction takes place? You have to become like this now. If you don't practise removing the clouds over a long period of time, the clouds would reappear at the last moment. If you are standing there to grant a vision and clouds suddenly appear, your whole programme will be upset. Now practise this so that any clouds disappear whilst at a distance. Science is able to change the direction of a storm or the path up a mountain, and yet science is not perfect. Science can never become perfect; for as long as it is based on the dictates of human beings, it will continue to fluctuate. So, it is unlawful. Those who follow the Father's shrimat are able to do whatever they want. You need to practise removing obstacles over a long period of time. All of you are making effort, but what is the speed of your efforts? If something only takes a second to do and you take two hours to do it, you would then run out of time. If you give the right answer to a question in an exam but not in time, would you pass or fail? It won't do simply to say that you are moving along. Don't just think that, because you go to class every day that you are regular and punctual and that you also do Baba's service, you can be pleased with yourself. You now have to become regular and punctual in following the Father's direction to become a constant and easy yogi. The Father will also mark you present in this. You do receive marks for being present in the first aspect, but you can claim a number ahead by being marked present in the second aspect. Which rosary are you going to become a part of? If you only sometimes remain stable in this stage, the rosary you go into will then be of those who are only worshipped sometimes. You will become a bead towards the end of the rosary. What service will you mothers do? Will you all claim number one? Will this become the number one group? Whatever service you do, you will receive one hundred, thousand-fold, multimillion-fold return of that. This is why this confluence age is for serving and receiving the return of it. As soon as you do something, you receive the reward of it. Do double service whilst living with your family. Through this, hands will be created and centres will be opened. There are very few surrendered hands, and so let them tour around, whilst you householders look after the centres. Centres can be opened in this way too. If you have complications with regard to your family or your children, you can rent a room and look after that. If there are no complications or obstacles with regard to your children, you can then open a centre in your home.


2. Do you remain constantly unshakeable and immovable?

In the previous cycle, Ravan's army tried to shake Angad, but, nevertheless, he remained unshakeable. Although adverse situations will come and go, your original stage will constantly enable you to make progress. By chasing after adverse situations, you lose your own original stage. No matter what situations arise, you should take a high jump and overcome the situation. It is a sign of good luck that such situations come. These papers are a means of making your foundation very strong. They come to check your faith by trying to shake you. Once you become as strong as Angad, they will just come to salute you. They will first come to you in their fearsome form and then as your servant. Challenge them and show them that you are mahavirs. Can a line be drawn on water? No situation can wage war on you master oceans of knowledge; nothing can draw a line on you.


3. Do you constantly maintain the deep concern of having faith in One and having one Support?

Those who constantly have one Support are able to remain constant and stable. No other sweetness can attract such souls. Such souls are constant lighthouses and move along while free from obstacles. They become instruments to show the path to many others. So, every day, as a lighthouse, how many souls do you show the path to? This is the duty, business and activity of Brahmins.


4. The revelation of the Father's image through the images of experience.

Are you constantly images of experience of the Father's virtues? You are experienced in all the virtues which are praised as the Father's, are you not? The Father is the Ocean of Bliss and so you are the images of experience who move along in the waves of the Ocean of Bliss. The Father's image is revealed through the images of experience who constantly experience all of the virtues. All of you are those who will reveal the Father. You are so great that you will reveal the Supreme Soul. Let the Father's virtues be visible through each one's face. Let whoever comes into contact with you experience bliss, love and happiness.


5. The fortune of those who have come late is no less, it is very elevated. How?

Those who have come late have come when everything has already been prepared. Just as grandparents plant seeds to provide for their grandchildren to eat from, so, those who have come late are also those who will eat the fruit of what has been planted here. You now have so many facilities and ready-made places. Others have been churning and you are eating the butter! This is why you are constantly happy. Constantly remember your fortune and the Bestower who has bestowed that fortune on you. BapDada constantly says: Young children are like God; they are equal to God.

Blessing: May you be seated on BapDada's heart-throne and forget your old body and the world.

The place for the elevated confluence-aged souls is BapDada's heart throne. You cannot receive such a throne throughout the whole cycle. You will of course continue to receive a throne for the kingdom of the world or the kingdom of a state, but you will not find this throne. This is such an unlimited throne that you can do whatever you want — walk, tour around, eat, sleep — and still be on the throne. The children who are always seated on BapDada's heart throne have forgotten their old bodies and the bodily world. They see it but do not see it.

Slogan: To race after limited name, honour and pride means to chase after a shadow.

* OM SHANTI *

Daily Positive Thoughts: April 26, 2015: Great Souls

Daily Positive Thoughts: April 26, 2015: Great Souls






Great Souls


Great souls take advantage of every moment and every opportunity to give happiness to others through kindness in their thoughts; such souls are willing to overlook weaknesses and mistakes and have the desire to help everyone reach their potential.


True Contentment


Many times I find that my words, actions or behaviour tend to upset
others in spite of my not wanting to hurt them. I seem to be very happy
with the situation, but others don't seem to be. At that time I am not
really able to understand the reason for this and I consider the
others to be unreasonable. I need to check myself when others are
getting upset with me. I need to make effort to check and change
myself constantly so that I am able to move along with the demands of
time. This is what will bring about true contentment - such
contentment that neither will I be upset nor will I upset others.



Experiencing Perfection And Success In Role Playing


Spirituality gives me the detached realization of being pure consciousness. This realization not only detaches me from my physical body, but also detaches me from the different roles I play through my physical body (male or female) and the different acts or scenes in each role, in one particular day or one particular lifetime. The roles may be many, the acts and the scenes may be many, but I am the actor playing the different roles and participating in the different acts.

There is great strength in experiencing myself as an actor as compared to the previous existence in which I used to lose myself and forget my spiritual identity completely while playing the different roles, identifying more with the roles and thinking myself to be the role instead of being a spiritual actor.  An actor, even while in the midst of the most dramatic scenes, even whilst getting excited or emotional or angry, knows he is not the part itself, the part is just temporary. He knows he is something more than that, and that when the play is over, the role will not exist anymore. So, even though I play my role, I don't cut off myself from the role and don't leave my responsibilities, I need to adopt the observer or spectator or detached consciousness instead of the player consciousness. A player tends to get over-involved. So, the balance has to be maintained - I play as well as remain detached. Only then the roles will be played to complete perfection and I will experience success in each role.

(To be continued tomorrow ...)



Soul Sustenance


Understanding And Expressing Your Potential - Part 2

A person with a free mind (discussed yesterday) can use all of their creative capacity in order to live out their dreams.

To use one's creative capacity fully means:

• Being aware of the power of the imagination and channeling it in a constructive way.

• Being able and to be open to discovering and to learning.

• Becoming aware and dissolving self-limiting beliefs.

• Being attracted by excellence, embracing the experiences of superior quality and letting go of the desires and experiences of lesser quality.

• Having good discrimination power thanks to which one has a good power of decision.

• Having the will power and discipline to apply decision.

• Having the courage to be different and to overcome obstacles.


Message for the day

To forgive is to give correction.

Expression: When there is forgiveness, the harm of the mistake is forgotten. The mistake itself is remembered only to the extent that the correction is to be given. So there are no negative feelings expressed even while giving correction. And the words that are used are few but prove to be very effective.

Experience: When I learn the art of forgiving I am able to be free from the burden of negative and waste thinking. So there is never any difficulty in giving correction when necessary. The mind is free from the attitudes of the past and it creates harmony in relationships even if the opinions or personalities don't match.


In Spiritual Service,
Brahma Kumaris


25-04-15 प्रातः मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन


25-04-15 प्रातः मुरली ओम् शान्ति बापदादामधुबन

 

मीठे बच्चे - बेहद बाप के साथ व़फादार रहो तो पूरी माइट मिलेगीमाया पर जीत होती जायेगी” 

 

प्रश्न:- बाप के पास मुख्य अथॉरिटी कौन-सी हैउसकी निशानी क्या है?

 

उत्तर:- बाप के पास मुख्य है ज्ञान की अथॉरिटी। ज्ञान सागर है इसलिए तुम बच्चों को पढ़ाई पढ़ाते हैं। आप समान नॉलेजफुल बनाते हैं। तुम्हारे पास पढ़ाई की एम ऑब्जेक्ट है। पढ़ाई से ही तुम ऊंच पद पाते हो।

गीतः- बदल जाए दुनिया........

 

ओम् शान्ति।

 

भक्त भगवान की महिमा करते हैं। अब तुम तो भक्त नहीं हो। तुम तो उस भगवान के बच्चे बन गये हो। वह भी व़फादार बच्चे चाहिए। हर बात में व़फादार रहना है। स्त्री की सिवाए पति के अथवा पति की सिवाए स्त्री के और तरफ दृष्टि जाए तो उनको भी बेव़फा कहेंगे। अब यहाँ भी है बेहद का बाप। उनके साथ बेव़फादार और व़फादार दोनों रहते हैं। व़फादार बनकर फिर बेव़फादार बन जाते हैं। बाप तो है हाइएस्ट अथॉरिटी। ऑलमाइटी है ना। तो उनके बच्चे भी ऐसे होने चाहिए। बाप में ताकत हैबच्चों को रावण पर जीत पाने की युक्ति बतलाते हैं इसलिए उनको कहा भी जाता है सर्वशक्तिमान्। तुम भी शक्ति सेना हो ना। तुम अपने को भी ऑलमाइटी कहेंगे। बाप में जो माइट है वह हमको देते हैं,बतलाते हैं कि तुम माया रावण पर जीत कैसे पा सकते होतो तुमको भी शक्तिवान बनना है। बाप है ज्ञान की अथॉरिटी। नॉलेजफुल है ना। जैसे वो लोग अथॉरिटी हैंशास्त्रों कीभक्तिमार्ग कीऐसे अब तुम ऑलमाइटी अथॉरिटी नॉलेजफुल बनते हो। तुमको भी नॉलेज मिलती है। यह पाठशाला है। इसमें जो नॉलेज तुम पढ़ते होइससे ऊंच पद पा सकते हो। यह एक ही पाठशाला है। तुमको तो यहाँ पढ़ना है और कोई प्रार्थना आदि नहीं करनी है। तुम्हें पढ़ाई से वर्सा मिलता हैएम ऑब्जेक्ट है। तुम बच्चे जानते हो बाप नॉलेजफुल हैउनकी पढ़ाई बिल्कुल डिफरेन्ट है। ज्ञान का सागर बाप है तो वही जाने। वही हमको सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का नॉलेज देते हैं। दूसरा कोई दे न सके। बाप सम्मुख आकर ज्ञान दे फिर चले जाते हैं। इस पढ़ाई की प्रालब्ध क्या मिलती हैवह भी तुम जानते हो। बाकी जो भी सतसंग आदि हैं वा गुरू गोसाई हैं वह सब हैं भक्ति मार्ग के। अब तुमको ज्ञान मिल रहा है। यह भी जानते हैं कि उनमें भी कोई यहाँ के होंगे तो निकल आयेंगे। तुम बच्चों को सर्विस की भिन्न-भिन्न युक्तियाँ निकालनी हैं। अपना अनुभव सुनाकर अनेकों का भाग्य बनाना है। तुम सर्विसएबुल बच्चों की अवस्था बड़ी निर्भयअडोल और योगयुक्त चाहिए। योग में रहकर सर्विस करो तो सफलता मिल सकती है।

बच्चेतुम्हें अपने को पूरा सम्भालना है। कभी आवेश आदि न आयेयोगयुक्त पक्का चाहिए। बाप ने समझाया है वास्तव में तुम सब वानप्रस्थी होवाणी से परे अवस्था वाले। वानप्रस्थी अर्थात् वाणी से परे घर को और बाप को याद करने वाले। इसके सिवाए और कोई तमन्ना नहीं। हमको अच्छे कपड़े चाहिएयह सब हैं छी-छी तमन्नायें। देह-अभिमान वाले सर्विस कर नहीं सकेंगे। देही-अभिमानी बनना पड़े। भगवान के बच्चों को तो माइट चाहिए। वह है योग की। बाबा तो सभी बच्चों को जान सकते हैं ना। बाबा झट बता देंगेयह-यह खामियां निकालो। बाबा ने समझाया है शिव के मन्दिर में जाओवहाँ बहुत तुमको मिलेंगे। बहुत हैं जो काशी में जाकर वास करते हैं। समझते हैं काशीनाथ हमारा कल्याण करेगा। वहाँ तुमको बहुत ग्राहक मिलेंगेपरन्तु इसमें बड़ा शुरूड़ बुद्धि (होशियार बुद्धि) चाहिए। गंगा स्नान करने वालों को भी जाकर समझा सकते हैं। मन्दिरों में भी जाकर समझाओ। गुप्त वेष में जा सकते हो। हनूमान का मिसाल। हो तो वास्तव में तुम ना। जुत्तियों में बैठने की बात नहीं है। इसमें बड़ा समझू सयाना चाहिए। बाबा ने समझाया है अभी कोई भी कर्मातीत नहीं बना है। कुछ न कुछ खामियां जरूर हैं।

तुम बच्चों को नशा चाहिए कि यह एक ही हट्टी हैजहाँ सबको आना है। एक दिन यह सन्यासी आदि सब आयेंगे। एक ही हट्टी है तो जायेंगे कहाँ। जो बहुत भटका हुआ होगाउनको ही रास्ता मिलेगा। और समझेंगे यह एक ही हट्टी है। सबका सद्गति दाता एक बाप है ना। ऐसा जब नशा चढ़े तब बात है। बाप को यही ओना है ना-मैं आया हूँ पतितों को पावन बनाए शान्तिधाम-सुखधाम का वर्सा देने। तुम्हारा भी यही धंधा है। सबका कल्याण करना है। यह है पुरानी दुनिया। इनकी आयु कितनी हैथोड़े टाइम में समझ जायेंगेयह पुरानी दुनिया खत्म होनी है। सभी आत्माओं को यह बुद्धि में आयेगानई दुनिया की स्थापना हो तब तो पुरानी दुनिया का विनाश हो। आगे चल फिर कहेंगे बरोबर भगवान यहाँ है। रचयिता बाप को ही भूल गये हैं। त्रिमूर्ति में शिव का चित्र उड़ा दिया हैतो कोई काम का नहीं रहा। रचयिता तो वह है ना। शिव का चित्र आने से क्लीयर हो जाता है-ब्रह्मा द्वारा स्थापना। प्रजापिता ब्रह्मा होगा तो जरूर बी.के. भी होने चाहिए। ब्राह्मण कुल सबसे ऊंचा होता है। ब्रह्मा की औलाद हैं। ब्राह्मणों को रचते कैसे हैंयह भी कोई नहीं जानते। बाप ही आकर तुमको शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं। यह बड़ी पेचीली बातें हैं। बाप जब सम्मुख आकर समझाये तब समझें। जो देवतायें थे वह शूद्र बने हैं। अब उन्हों को कैसे ढूंढ़े उसके लिए युक्तियां निकालनी हैं। जो समझ जाएं यह बी.के. का तो भारी कार्य है। कितने पर्चे आदि बांटते हैं। बाबा ने एरोप्लेन से पर्चे गिराने लिए भी समझाया है। कम से कम अखबार जितना एक कागज होउसमें मुख्य प्वाइंट्स सीढ़ी आदि भी आ सकती है। मुख्य है अंग्रेजी और हिन्दी भाषा। तो बच्चों को सारा दिन ख्यालात रखनी चाहिए-सर्विस को कैसे बढ़ायेंयह भी जानते हैं ड्रामा अनुसार पुरूषार्थ होता रहता है। समझा जाता है यह सर्विस अच्छी करते हैंइनका पद भी ऊंच होगा। हर एक एक्टर का अपना पार्ट हैयह भी लाइन जरूर लिखनी है। बाप भी इस ड्रामा में निराकारी दुनिया से आकर साकारी शरीर का आधार ले पार्ट बजाते हैं। अभी तुम्हारी बुद्धि में हैकौन-कौन कितना पार्ट बजाते हैंतो यह लाइन भी मुख्य है। सिद्ध कर बतलाना हैयह सृष्टि चक्र को जानने से मनुष्य स्वदर्शन चक्रधारी बन चक्रवर्ती राजा विश्व का मालिक बन सकते हैं। तुम्हारे पास तो सारी नॉलेज है ना। बाप के पास नॉलेज है ही गीता कीजिससे मनुष्य नर से नारायण बनते हैं। फुल नॉलेज बुद्धि में आ गई तो फिर फुल बादशाही चाहिए। तो बच्चों को ऐसे-ऐसे ख्याल कर और बाप की सर्विस में लग जाना चाहिए।

जयपुर में भी यह रूहानी म्युज़ियम स्थाई रहेगा। लिखा हुआ है-इनको समझने से मनुष्य विश्व का मालिक बन सकते हैं। जो देखेंगे एक-दो को सुनाते रहेंगे। बच्चों को सदा सर्विस पर रहना है। मम्मा भी सर्विस पर हैउनको मुकरर किया था। यह कोई शास्त्रों में है नहीं कि सरस्वती कौन हैप्रजापिता ब्रह्मा की सिर्फ एक बेटी होगी क्याअनेक बेटियाँ अनेक नाम वाली होंगी ना। वह फिर भी एडाप्ट थी। जैसे तुम हो। एक हेड चला जाता है तो फिर दूसरा स्थापन किया जाता है। प्राइम मिनिस्टर भी दूसरा स्थापन कर लेते हैं। एबुल समझा जाता हैतब उनको पसन्द करते हैं फिर टाइम पूरा हो जाता हैतो फिर दूसरे को चुनना पड़ता है। बाप बच्चों को पहला मैनर्स यही सिखलाते हैं कि तुम किसका रिगार्ड कैसे रखो! अनपढ़े जो होते हैं उनको रिगार्ड रखना भी नहीं आता है। जो जास्ती तीखे हैं तो उनका सबको रिगार्ड रखना ही है। बड़ों का रिगार्ड रखने से वह भी सीख जायेंगे। अनपढ़े तो बुद्धू होते हैं। बाप ने भी अनपढ़ों को आकर उठाया है। आजकल फीमेल को आगे रखते हैं। तुम बच्चे जानते हो हम आत्माओं की सगाई परमात्मा के साथ हुई है। तुम बड़े खुश होते हो-हम तो विष्णुपुरी के मालिक जाकर बनेंगे। कन्या का बिगर देखे भी बुद्धियोग लग जाता है ना। यह भी आत्मा जानती है-यह आत्मा और परमात्मा की सगाई वन्डरफुल है। एक बाप को ही याद करना पड़े। वह तो कहेंगे गुरू को याद करो,फलाना मत्र याद करो। यह तो बाप ही सब कुछ है। इन द्वारा आकर सगाई कराते हैं। कहते हैं मैं तुम्हारा बाप भी हूँमेरे से वर्सा मिलता है। कन्या की सगाई होती है तो फिर भूलती नहीं है। तुम फिर भूल क्यों जाते होकर्मातीत अवस्था को पाने में टाइम लगता है। कर्मातीत अवस्था को पाकर वापिस तो कोई जा न सके। जब साजन पहले चले फिर बरात जाये। शंकर की बात नहींशिव की बरात है। एक है साजन बाकी सब हैं सजनियां। तो यह है शिवबाबा की बरात। नाम रख दिया है बच्चे का। दृष्टान्त दे समझाया जाता है। बाप आकर गुल-गुल बनाए सबको ले जाते हैं। बच्चे जो काम चिता पर बैठ पतित बन गये हैं उनको ज्ञान चिता पर बिठाए गुल-गुल बनाकर सभी को ले जाते हैं। यह तो पुरानी दुनिया है ना। कल्प-कल्प बाप आते हैं। हम छी-छी को आकर गुल-गुल बनाए ले जाते हैं। रावण छी-छी बनाते हैं और शिवबाबा गुल-गुल बनाते हैं। तो बाबा बहुत युक्तियां समझाते रहते हैं। अच्छा!

 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

 

धारणा के लिए मुख्य सार :-

 

1) खाने पीने की छी-छी तमन्नाओं को छोड़ देही-अभिमानी बन सर्विस करनी है। याद से माइट (शक्ति) ले निर्भय और अडोल अवस्था बनानी है।

2) जो पढ़ाई में तीखे होशियार हैंउनका रिगार्ड रखना है। जो भटक रहे हैंउनको रास्ता बताने की युक्ति रचनी है। सबका कल्याण करना है।

 


वरदान:-श्रेष्ठ वेला के आधार पर सर्व प्राप्तियों के अधिकार का अनुभव करने वाले पदमापदम भाग्यशाली भव!

 

जो श्रेष्ठ वेला में जन्म लेने वाले भाग्यशाली बच्चे हैंवह कल्प पहले की टचिंग के आधार पर जन्मते ही अपने पन का अनुभव करते हैं। वह जन्मते ही सर्व प्रापर्टी के अधिकारी होते हैं। जैसे बीज में सारे वृक्ष का सार समाया हुआ है ऐसे नम्बरवन वेला वाली आत्मायें सर्व स्वरूप की प्राप्ति के खजाने के आते ही अनुभवी बन जाते हैं। वे कभी ऐसे नहीं कहेंगे कि सुख का अनुभव होताशान्ति का नहीं,शान्ति का होता सुख का व शक्ति का नहीं। सर्व अनुभवों से सम्पन्न होते हैं।

 

स्लोगन:- अपने प्रसन्नता की छाया से शीतलता का अनुभव कराने के लिए निर्मल और निर्मान बनो।

 

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