कम बोलो, धीरे बोलो, मीठा बोलो            सोच के बोलो, समझ के बोलो, सत्य बोलो            स्वमान में रहो, सम्मान दो             निमित्त बनो, निर्मान बनो, निर्मल बोलो             निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनो      शुभ सोचो, शुभ बोलो, शुभ करो, शुभ संकल्प रखो          न दुःख दो , न दुःख लो          शुक्रिया बाबा शुक्रिया, आपका लाख लाख पद्मगुना शुक्रिया !!! 

31-03-15 प्रातः मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन


31-03-15 प्रातः मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन


मीठे बच्चे-तुम्हें अपने योगबल से सारी सृष्टि को पावन बनाना है, तुम योगबल से ही माया पर जीत पाकर जगतजीत बन सकते हो

प्रश्न:- बाप का पार्ट क्या है, उस पार्ट को तुम बच्चों ने किस आधार पर जाना है?

उत्तर:- बाप का पार्ट है-सबके दु:ख हरकर सुख देना, रावण की जंजीरों से छुड़ाना। जब बाप आते हैं तो भक्ति की रात पूरी होती है। बाप तुम्हें स्वयं अपना और अपनी जायदाद का परिचय देते हैं। तुम एक बाप को जानने से ही सब कुछ जान जाते हो।

गीत:- तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो........

ओम् शान्ति।

बच्चों ने ओम् शान्ति का अर्थ समझा है, बाप ने समझाया है हम आत्मा हैं, इस सृष्टि ड्रामा के अन्दर हमारा मुख्य पार्ट है। किसका पार्ट है? आत्मा शरीर धारण कर पार्ट बजाती है। तो बच्चों को अब आत्म-अभिमानी बना रहे हैं। इतना समय देह-अभिमानी थे। अब अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है। हमारा बाबा आया हुआ है ड्रामा प्लैन अनुसार। बाप आते भी हैं रात्रि में। कब आते हैं-उसकी तिथि-तारीख कोई नहीं है। तिथि-तारीख उनकी होती है जो लौकिक जन्म लेते हैं। यह तो है पारलौकिक बाप। इनका लौकिक जन्म नहीं है। कृष्ण की तिथि, तारीख, समय आदि सब देते हैं। इनका तो कहा जाता है दिव्य जन्म। बाप इनमें प्रवेश कर बताते हैं कि यह बेहद का ड्रामा है। उसमें आधाकल्प है रात। जब रात अर्थात् घोर अन्धियारा होता है तब मैं आता हूँ। तिथि-तारीख कोई नहीं। इस समय भक्ति भी तमोप्रधान है। आधा कल्प है बेहद का दिन। बाप खुद कहते हैं मैंने इनमें प्रवेश किया है। गीता में है भगवानुवाच, परन्तु भगवान मनुष्य हो नहीं सकता। कृष्ण भी दैवी गुणों वाला है। यह मनुष्य लोक है। यह देव लोक नहीं है। गाते भी हैं ब्रह्मा देवताए नम:...... वह है सूक्ष्मवतनवासी। बच्चे जानते हैं वहाँ हड्डी-मास नहीं होता है। वह है सूक्ष्म सफेद छाया। जब मूलवतन में है तो आत्मा को न सूक्ष्म शरीर छाया वाला है, न हड्डी वाला है। इन बातों को कोई भी मनुष्य मात्र नहीं जानते हैं। बाप ही आकर सुनाते हैं, ब्राह्मण ही सुनते हैं, और कोई नहीं सुनते। ब्राह्मण वर्ण होता ही है भारत में, वह भी तब होता है जब परमपिता परमात्मा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण धर्म की स्थापना करते हैं। अब इनको रचता भी नहीं कहेंगे। नई रचना कोई रचते नहीं हैं। सिर्फ रिज्युवनेट करते हैं। बुलाते भी हैं - हे बाबा, पतित दुनिया में आकर हमको पावन बनाओ। अभी तुमको पावन बना रहे हैं। तुम फिर योगबल से इस सृष्टि को पावन बना रहे हो। माया पर तुम जीत पाकर जगत जीत बनते हो। योगबल को साइंस बल भी कहा जाता है। ऋषि-मुनि आदि सब शान्ति चाहते हैं परन्तु शान्ति का अर्थ तो जानते नहीं। यहाँ तो जरूर पार्ट बजाना है ना। शान्तिधाम है स्वीट साइलेन्स होम। तुम आत्माओं को अब यह मालूम है कि हमारा घर शान्तिधाम है। यहाँ हम पार्ट बजाने आये हैं। बाप को भी बुलाते हैं-हे पतित-पावन, दु:ख हर्ता, सुख कर्ता आओ, हमको इस रावण की जंजीरों से छुड़ाओ। भक्ति है रात, ज्ञान है दिन। रात मुर्दाबाद होती है फिर ज्ञान जिंदाबाद होता है। यह खेल है सुख और दु:ख का। तुम जानते हो पहले हम स्वर्ग में थे फिर उतरते-उतरते आकर नीचे हेल में पड़े हैं। कलियुग कब खलास होगा फिर सतयुग कब आयेगा, यह कोई नहीं जानते। तुम बाप को जानने से बाप द्वारा सब कुछ जान गये हो। मनुष्य भगवान को ढूँढने के लिए कितना धक्का खाते हैं। बाप को जानते ही नहीं। जानें तब जब बाप आकर अपना और जायदाद का परिचय दें। वर्सा बाप से ही मिलता है, माँ से नहीं। इनको मम्मा भी कहते हैं, परन्तु इनसे वर्सा नहीं मिलता है, इनको याद भी नहीं करना है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी शिव के बच्चे हैं - यह भी कोई नहीं जानते। बेहद की सारी दुनिया का रचयिता एक ही बाप है। बाकी सब हैं उनकी रचना या हद के रचयिता। अब तुम बच्चों को बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हों। मनुष्य बाप को नहीं जानते हैं तो किसको याद करें? इसलिए बाप कहते हैं कितने निधनके बन पड़े हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है।

भक्ति और ज्ञान दोनों में सबसे श्रेष्ठ कर्म है-दान करना। भक्ति मार्ग में ईश्वर अर्थ दान करते हैं। किसलिए? कोई कामना तो जरूर रहती है। समझते हैं जैसा कर्म करेंगे वैसा फल दूसरे जन्म में पायेंगे, इस जन्म में जो करेंगे उसका फल दूसरे जन्म में पायेंगे। जन्म-जन्मान्तर नहीं पायेंगे। एक जन्म के लिए फल मिलता है। सबसे अच्छे ते अच्छा कर्म होता है दान। दानी को पुण्यात्मा कहा जाता है। भारत को महादानी कहा जाता है। भारत में जितना दान होता है उतना और कोई खण्ड में नहीं। बाप भी आकर बच्चों को दान करते हैं, बच्चे फिर बाप को दान करते हैं। कहते हैं बाबा आप आयेंगे तो हम अपना तन-मन-धन सब आपके हवाले कर देंगे। आप बिगर हमारा कोई नहीं। बाप भी कहते हैं मेरे लिए तुम बच्चे ही हो। मुझे कहते ही हैं हेविनली गॉड फादर अर्थात् स्वर्ग की स्थापना करने वाला। मैं आकर तुमको स्वर्ग की बादशाही देता हूँ। बच्चे मेरे अर्थ सब कुछ दे देते हैं - बाबा सब कुछ आपका है। भक्ति मार्ग में भी कहते थे-बाबा, यह सब कुछ आपका दिया हुआ है। फिर वह चला जाता है तो दु:खी हो जाते हैं। वह है भक्ति का अल्पकाल का सुख। बाप समझाते हैं भक्ति मार्ग में तुम मुझे दान-पुण्य करते हो इनडायरेक्ट। उसका फल तो तुमको मिलता रहता है। अब इस समय मैं तुमको कर्म- अकर्म-विकर्म का राज बैठ समझाता हूँ। भक्ति मार्ग में तुम जैसे कर्म करते हो उसका अल्पकाल सुख भी मेरे द्वारा तुमको मिलता है। इन बातों का दुनिया में किसको पता नहीं है। बाप ही आकर कर्मों की गति समझाते हैं। सतयुग में कभी कोई बुरा कर्म करते ही नहीं। सदैव सुख ही सुख है। याद भी करते हैं सुखधाम, स्वर्ग को। अभी बैठे हैं नर्क में। फिर भी कह देते-फलाना स्वर्ग पधारा। आत्मा को स्वर्ग कितना अच्छा लगता है। आत्मा ही कहती है ना-फलाना स्वर्ग पधारा। परन्तु तमोप्रधान होने के कारण उनको कुछ पता नहीं पड़ता है कि स्वर्ग क्या, नर्क क्या है? बेहद का बाप कहते हैं तुम सब कितने तमोप्रधान बन गये हो। ड्रामा को तो जानते नहीं। समझते भी हैं कि सृष्टि का चक्र फिरता है तो जरूर हूबहू फिरेगा ना। वह सिर्फ कहने मात्र कह देते हैं। अभी यह है संगमयुग। इस एक ही संगमयुग का गायन है। आधाकल्प देवताओं का राज्य चलता है फिर वह राज्य कहाँ चला जाता, कौन जीत लेते हैं? यह भी किसको पता नहीं। बाप कहते हैं रावण जीत लेता है। उन्होंने फिर देवताओं और असुरों की लड़ाई बैठ दिखाई है।

अब बाप समझाते हैं-5 विकारों रूपी रावण से हारते हैं फिर जीत भी पाते हैं रावण पर। तुम तो पूज्य थे फिर पुजारी पतित बन जाते हो तो रावण से हारे ना। यह तुम्हारा दुश्मन होने के कारण तुम सदैव जलाते आये हो। परन्तु तुमको पता नहीं है। अब बाप समझाते हैं रावण के कारण तुम पतित बने हो। इन विकारों को ही माया कहा जाता है। माया जीत, जगत जीत। यह रावण सबसे पुराना दुश्मन है। अभी श्रीमत से तुम इन 5 विकारों पर जीत पाते हो। बाप आये हैं जीत पहनाने। यह खेल है ना। माया ते हारे हार, माया ते जीते जीत। जीत बाप ही पहनाते हैं इसलिए इनको सर्वशक्तिमान कहा जाता है। रावण भी कम शक्तिमान नहीं है। परन्तु वह दु:ख देते हैं इसलिए गायन नहीं है। रावण है बहुत दुश्तर। तुम्हारी राजाई ही छीन लेते हैं। अभी तुम समझ गये हो - हम कैसे हारते हैं फिर कैसे जीत पाते हैं? आत्मा चाहती भी है हमको शान्ति चाहिए। हम अपने घर जावें। भक्त भगवान को याद करते हैं परन्तु पत्थरबुद्धि होने कारण समझते नहीं हैं। भगवान बाबा है, तो बाप से जरूर वर्सा मिलता होगा। मिलता भी जरूर है परन्तु कब मिलता है फिर कैसे गँवाते हैं, यह नहीं जानते हैं। बाप कहते हैं मैं इस ब्रह्मा तन द्वारा तुमको बैठ समझाता हूँ। मुझे भी आरगन्स चाहिए ना। मुझे अपनी कर्मेन्द्रियां तो हैं नहीं। सूक्ष्मवतन में भी कर्मेन्द्रियां हैं। चलते फिरते जैसे मूवी बाइसकोप होता है, यह मूवी टॉकी बाइसकोप निकले हैं तो बाप को भी समझाने में सहज होता है। उन्हों का है बाहुबल, तुम्हारा है योगबल। वह दो भाई भी अगर आपस में मिल जाएं तो विश्व पर राज्य कर सकते हैं। परन्तु अभी तो फूट पड़ी हुई है। तुम बच्चों को साइलेन्स का शुद्ध घमण्ड रहना चाहिए। तुम मनमनाभव के आधार से साइलेन्स द्वारा जगतजीत बन जाते हो। वह है साइंस घमण्डी। तुम साइलेन्स घमण्डी अपने को आत्मा समझ बाप को याद करते हो। याद से तुम सतोप्रधान बन जायेंगे। बहुत सहज उपाय बताते हैं। तुम जानते हो शिवबाबा आये हैं हम बच्चों को फिर से स्वर्ग का वर्सा देने। तुम्हारा जो भी कलियुगी कर्मबन्धन है, बाप कहते हैं उनको भूल जाओ। 5 विकार भी मुझे दान में दे दो। तुम जो मेरा-मेरा करते आये हो, मेरा पति, मेरा फलाना, यह सब भूलते जाओ। सब देखते हुए भी उनसे ममत्व मिटा दो। यह बात बच्चों को ही समझाते हैं। जो बाप को जानते ही नहीं, वह तो इस भाषा को भी समझ न सकें। बाप आकर मनुष्य से देवता बनाते हैं। देवतायें होते ही सतयुग में हैं। कलियुग में होते हैं मनुष्य। अभी तक उनकी निशानियां हैं अर्थात् चित्र हैं। मुझे कहते ही हैं पतित-पावन। मैं तो डिग्रेड होता नहीं हूँ। तुम कहते हो हम पावन थे फिर डिग्रेड हो पतित बने हैं। अब आप आकर पावन बनाओ तो हम अपने घर में जायें। यह है स्प्रीचुअल नॉलेज। अविनाशी ज्ञान रत्न हैं ना। यह है नई नॉलेज। अभी तुमको यह नॉलेज सिखाता हूँ। रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अन्त का राज बताता हूँ। अभी यह तो है पुरानी दुनिया। इसमें तुम्हारे जो भी मित्र सम्बन्धी आदि हैं, देह सहित सबसे ममत्व निकाल दो।

अभी तुम बच्चे अपना सब कुछ बाप हवाले करते हो। बाप फिर स्वर्ग की बादशाही 21 जन्मों के लिए तुम्हारे हवाले कर देते हैं। लेन-देन तो होती है ना। बाप तुमको 21 जन्मों के लिए राज्य-भाग्य देते हैं। 21 जन्म, 21 पीढ़ी गाये जाते हैं ना अर्थात् 21 जन्म पूरी लाइफ चलती है। बीच में कभी शरीर छूट नहीं सकता। अकाले मृत्यु नहीं होती। तुम अमर बन और अमरपुरी के मालिक बनते हो। तुमको कभी काल खा न सके। अभी तुम मरने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो। बाप कहते हैं देह सहित देह के सब सम्बन्ध छोड़ एक बाप से सम्बन्ध रखना है। अब जाना ही है सुख के सम्बन्ध में। दु:ख के बन्धनों को भूलते जायेंगे। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनना है। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो, साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करो। इन देवताओं जैसा बनना है। यह है एम ऑबजेक्ट। यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक थे, इन्हों ने कैसे राज्य पाया, फिर कहाँ गये, यह किसको पता नहीं है। अभी तुम बच्चों को दैवी गुण धारण करने हैं। किसको भी दु:ख नहीं देना है। बाप है ही दु:ख हर्ता, सुख कर्ता। तो तुमको भी सुख का रास्ता सबको बताना है अर्थात् अन्धों की लाठी बनना है। अभी बाप ने तुम्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र दिया है। तुम जानते हो बाप कैसे पार्ट बजाते हैं। अभी बाप जो तुमको पढ़ा रहे हैं फिर यह पढ़ाई प्राय:लोप हो जायेगी। देवताओं में यह नॉलेज रहती नहीं। तुम ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण ही रचता और रचना के ज्ञान को जानते हो। और कोई जान नहीं सकते। इन लक्ष्मी-नारायण आदि में भी अगर यह ज्ञान होता तो परम्परा चला आता। वहाँ ज्ञान की दरकार ही नहीं रहती क्योंकि वहाँ है ही सद्गति। अभी तुम सब कुछ बाप को दान देते हो तो फिर बाप तुमको 21 जन्मों के लिए सब कुछ दे देते हैं। ऐसा दान कभी होता नहीं। तुम जानते हो हम सर्वन्श देते हैं - बाबा यह सब कुछ आपका है, आप ही हमारे सब कुछ हो। त्वमेव माताश्च पिता ........ पार्ट तो बजाते हैं ना। बच्चों को एडाप्ट भी करते हैं फिर खुद ही पढ़ाते हैं। फिर खुद ही गुरू बन सबको ले जाते हैं। कहते हैं तुम मुझे याद करो तो पावन बन जायेंगे फिर तुमको साथ ले जाऊंगा। यह यज्ञ रचा हुआ है। यह है शिव ज्ञान यज्ञ, इसमें तुम तन-मन-धन सब स्वाहा कर देते हो। खुशी से सब अर्पण हो जाता है। बाकी आत्मा रह जाती है। बाबा, बस अब हम आपकी श्रीमत पर ही चलेंगे। बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनना है। 60 वर्ष की आयु जब होती है तो वानप्रस्थ अवस्था में जाने की तैयारी करते हैं परन्तु वह कोई वापिस जाने के लिए थोड़ेही तैयारी करते हैं। अभी तुम सतगुरू का मन्त्र लेते हो मनमनाभव। भगवानुवाच - तुम मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। सबको कहो आप सबकी वानप्रस्थ अवस्था है। शिवबाबा को याद करो, अब जाना है अपने घर। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार :-

1) कलियुगी सर्व कर्मबन्धनों को बुद्धि से भूल 5 विकारों का दान कर आत्मा को सतोप्रधान बनाना है। एक ही साइलेन्स के शुद्ध घमण्ड में रहना है।

2) इस रूद्र यज्ञ में खुशी से अपना तन-मन-धन सब अर्पण कर सफल करना है। इस समय सब कुछ बाप हवाले कर 21 जन्मों की बादशाही बाप से ले लेनी है।

वरदान:- अपनी शुभ भावना द्वारा निर्बल आत्माओं में बल भरने वाले सदा शक्ति स्वरूप भव!

सेवाधारी बच्चों की विशेष सेवा है-स्वयं शक्ति स्वरूप रहना और सर्व को शक्ति स्वरूप बनाना अर्थात् निर्बल आत्माओं में बल भरना। इसके लिए सदा शुभ भावना और श्रेष्ठ कामना स्वरूप बनो। शुभ भावना का अर्थ यह नहीं कि किसी में भावना रखते-रखते उसके भाववान हो जाओ। यह गलती नहीं करना। शुभ भावना भी बेहद की हो। एक के प्रति विशेष भावना भी नुकसानकारक है इसलिए बेहद में स्थित हो निर्बल आत्माओं को अपनी प्राप्त हुई शक्तियों के आधार से शक्ति स्वरूप बनाओ।

स्लोगन:- अलंकार ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार हैं-इसलिए अलंकारी बनो देह अहंकारी नहीं।

Om Shanti ! Sakar Murli March 31, 2015





 
Om Shanti ! Sakar Murli March 31, 2015

Essence: Sweet children, you have to purify the entire world with the power of yoga (yogbal). By conquering Maya with the power of yoga you can become the conquerors of the world (jagatjeet). 

Question: What is the Father's part? On what basis have you children recognised that part? 

Answer: The Father's part is to remove everyone's sorrow and bestow happiness, to release everyone from the chains of Ravan. The night of devotion ends when the Father comes. The Father Himself gives you His own introduction and also the introduction of His property. By knowing the one Father you come to know everything. 

Song: You are the Mother and You are the Father. .. तुम्ही हो माता पिता तुम्हीं हो.... Tumhi ho mata pita tumhi ho...
http://www.youtube.com/watch?v=hQfsFAUnR0I&feature=email

Om shanti.

 You children have understood the meaning of "Om shanti". The Father has explained that each of you is a soul and that you have the main parts in this world drama. Who has this part? Souls adopt bodies and act out their parts. So, He is now making you children soul conscious. You have been body conscious for so long. Now consider yourself to be a soul and remember the Father. Our Baba has now come according to the drama plan. The Father comes in the night. There is no date or time recorded of when He comes. There is a date and time of those who take physical birth. That One is the parlokik Father. He doesn't take a physical birth. They give the date and time etc. of the birth of Krishna. For that One, (Shiva) it is said that He takes divine birth. The Father enters this one and tells us that this is the unlimited drama. Within this drama, half the cycle is the night. I come when it is the night, when there is extreme darkness. There is no date or time for that. At present, devotion too is tamopradhan. For half the cycle it is the unlimited day. The Father Himself says: I have entered this one. It says in the Gita, "God speaks." However, no human being can be God. Krishna too is a human being, but with divine virtues. This is the world of human beings; it is not the world of deities. It is sung: "Salutations to the deity Brahma." He is a resident of the subtle region. You children know that there is no flesh or bones there. There is a subtle white shadow of light. When souls are in the incorporeal world, they neither have subtle bodies nor bodies of bones. No human being knows any of this. Only the Father comes and tells you all of this. It is only you Brahmins, and no one else, who listen to this. The Brahmin clan only exists in Bharat and that can only be when the Supreme Father, the Supreme Soul, establishes the Brahmin religion through Prajapita Brahma. He shouldn't be called the Creator. It is not that He creates a new creation; He simply rejuvenates it. You call out to Him: "0 Baba, come into this impure world and make us pure!" He is now making you pure. You then purify this world with the power of yoga. By conquering Maya you become the conquerors of the world. The power of yoga is also called the power of science. Rishis and munis etc. want peace, but they don't know the meaning of peace. Here, you definitely need to play a part. The land of silence is your sweet home of silence. You souls now know that your home is the land of silence. We have come here to play our parts. They also call out to the Father: "0 Purifier, Remover of Sorrow, Bestower of Happiness, come and release us from these chains of Ravan!" Devotion is the night and knowledge is the day. When the night comes to an end, there is victory for knowledge. This is a play about happiness and sorrow. You now know that, in the beginning, you were in heaven, that you gradually came down and then reached hell. No one knows when the iron age will end or when the golden age will begin. By coming to know the Father, you come to know everything from Him. People stumble around so much in their search for God. They don't know the Father. Only when He Himself comes and gives His own introduction and the introduction of His property can they know Him. The inheritance is received from the Father, not from the mother. This one is also called Mama, the mother, but you do not receive an inheritance from him. You mustn't remember him. Brahma, Vishnu and Shankar are also the children of Shiva. No one knows this either. Only the one Father is the Creator of the entire, unlimited world. All others are His creation; they are limited creators. The Father now tells you children: Remember Me and your sins will be absolved. Human beings do not know their Father, and so whom would they remember? Therefore, the Father says: They have become complete orphans. This too is fixed in the drama. Both in devotion and in knowledge the most elevated act is the giving of donations. On the path of devotion, people donate in the name of God. For what? They definitely do have some desire. They do understand that whatever act they perform, they will receive the fruit of that in the next birth. Whatever they do in their present birth, they will receive the fruit of that in their next birth. They will not receive it for birth after birth; they only receive the fruit for one birth. The best act is to donate. A donor is called a charitable soul. Bharat is said to be the great donor. They don't give as many donations in other lands as they do in Bharat. The Father too, comes and donates to you children and you children then donate to the Father. It is said, "Baba, when You come, we will give You everything - body, mind and wealth. We have no one but You." The Father says: I, too, only have you children. You call Me Heavenly God, the Father, that is, the One who creates heaven. I come and give you the sovereignty of heaven. You children give everything to Me, saying: Baba, all of this is Yours. On the path of devotion, you also used to say: Baba, all of this has been given to us by You. Then, when it goes away you become unhappy. That is the temporary happiness of devotion. The Father explains: On the path of devotion, you used to give donations and perform charity indirectly. You continued to receive the fruit of that. Now, at this present time, I explain to you the significance of action, sinful action and neutral action. Whatever actions you performed on the path of devotion, you received the temporary happiness of that through Me. No one else in the world knows these aspects. Only the Father comes and tells you the depths of the philosophy of karma. No one performs bad actions in the golden age. There is happiness and only happiness there. People remember heaven as the land of happiness. Everyone is now sitting in hell and, even then, they say that so-and-so went to heaven. Souls like heaven so much! It is the soul that says: So-and-so went to heaven. However, because souls are now tamopradhan, they do not know what heaven is or what hell is. The unlimited Father says: All of you have become so tamopradhan! You do not know the drama. You understand that the world cycle turns and so it must definitely turn identically. People say this simply for the sake of saying it. It is now the confluence age. There is praise of only this one confluence age. The kingdom of the deities lasts for half a cycle. Then, where does that kingdom disappear to? Who conquers it? No one knows this. The Father says: Ravan conquers it. They have then shown a war between the deities and the devils. The Father now explains: You are defeated by the five vices of Ravan, and you then also gain victory over Ravan. You were worthy of being worshipped and you then became worshippers; you became impure. Therefore, you were defeated by Ravan. It is because Ravan is your enemy that you have been burning his effigy all this time. However, you didn't know this. The Father now explains: You became impure because of Ravan. These vices are called Maya. Those who conquer Maya become the conquerors of the world. Ravan is your oldest enemy. You now gain victory over these five vices by following shrimat. The Father has come to make you victorious. This is a game. Those who lose to Maya lose everything, and those who win against Maya win everything. Only the Father enables you to win. This is why He is called the Almighty Authority. Ravan too is no less of an almighty authority, but, because he gives sorrow, he isn't praised. Ravan is very powerful. He snatches your kingdom away. You now understand how you lose it and how you win it back. Souls also want peace: I want to return to my home. Devotees remember God, but, because their intellects are like stone, they do not understand that God is the Father, and that they must therefore surely receive an inheritance from Him. You definitely do receive it, but you don't know when you receive it, or how you then lose it. The Father says: I sit in this body of Brahma and explain to you. I too need physical organs. I do not have physical organs of my own. There are sense organs in the subtle region too. You walk and move around just like in a silent movie. Those movies and talkies emerged and so the Father finds it easy to explain. They have physical power whereas you have the power of yoga. If those two brothers (Russia and America) were to come together, they could rule the whole world. However, at present, they are disunited. You children should have the pure pride of silence. You conquer the world through silence and on the basis of "Manmanabhav". They have pride in science, whereas you have pride in silence, in which you consider yourselves to be souls and remember the Father. It is through this remembrance that you become satopradhan. Baba shows you a very easy method. You know that Shiv Baba has come in order to give you children your inheritance of heaven once again. Whatever iron-aged bondages you have, the Father says: Forget them! Even donate your five vices to Me! You have been saying "Mine, mine" for a long time: "My husband, my this, my that". Forget all of it. Whilst seeing everything, let there be no attachment to anything. Baba explains these things to only you children. Those who do not know the Father cannot understand this language. The Father comes and changes ordinary humans into deities. Deities exist in the golden age. There are ordinary human beings in the iron age. Even now, there are still signs of the deities; there are images. You call Me, "The Purifier". I do not become degraded. You say: We were pure, and then we became degraded and impure. Now, You have to come and purify us so that we can return to our home. This is spiritual knowledge. These are imperishable jewels of knowledge. This is new knowledge. I now teach you this knowledge and tell you the secrets of the Creator and the beginning, the middle and the end of creation. This is now the old world. Remove all your attachment from everyone including your friends, relatives and even your own bodies. You children now give everything to the Father. The Father then gives you the sovereignty of heaven for 21 births. Giving and taking takes place, does it not? The Father gives you your fortune of the kingdom for 21 births. People speak of 21 births, 21 generations. It means that you have full life-spans for 21 births. There, you do not shed your body in middle age; there is no untimely death. You become immortal and the masters of the land of immortality. Death never comes to you there. You are now making effort to die. The Father says: Renounce all bodily relations including your own body and have all your relationships with the one Father. You now have to go into relationships of happiness. You will continue to forget the bondages of sorrow. Whilst living at home with your family you have to become pure. The Father says: Constantly remember Me alone and, together with that, imbibe divine virtues as well. Become like these deities. This is your aim and objective. Lakshmi and Narayan were the masters of heaven. How did they claim that kingdom? Where did they then go? No one knows this. You children now have to imbibe these divine virtues. Never cause sorrow for anyone. The Father is the Remover of Sorrow and the Bestower of Happiness. Therefore, you have to show everyone this path of happiness, that is, you have to become sticks for the blind. You too were blind; you were children of the blind. The Father has now given you the third eye of knowledge. You now know how the Father plays His part. Everything the Father teaches you now will later disappear. Deities don't have this knowledge. Only you Brahmins, the mouth-born children of Brahma, know the knowledge of the Creator and creation. No one else can know this. If Lakshmi and Narayan had had this knowledge, it would mean that it continues from the very beginning of time. There, there is no need for knowledge because everyone there is in the state of salvation. You now donate everything to the Father, and the Father then gives you everything for 21 births. No one else can make such a donation. You know that you have to give everything. Baba, all of this belongs to You. You are everything for us. You are the Mother and the Father. (Twamev mataashch pita twamev..)He plays His part. He adopts us children and then He Himself teaches us. Then, He Himself becomes the Guru and takes us back home. He says: Remember Me and you will become pure. I will then take you back home with Me. This sacrificial fire that has been created is the sacrificial fire of the knowledge of Shiva. You sacrifice your body, mind and wealth in this. You surrender everything in happiness. Only the soul remains. Baba, we will now only follow Your shrimat. The Father says: Whilst living at home with your family you have to become pure. When someone reaches the age of 60 he makes preparations to go into the stage of retirement. However, he doesn't make preparations to return home. You now receive a mantra from the Satguru: Manmanabhav! God speaks: Remember Me and your sins will be absolved. Tell everyone: It is now the age of retirement for all of you. Remember Shiv Baba! You now have to return to your home. Achcha. 


To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children. 


Essence for dharna: 

1. Make the soul satopradhan by removing all your iron-aged bondages of karma (kaliyugi karmbandhan) from your intellect and by donating the five vices. Maintain the pure pride of silence. 

2. Use your body, mind and wealth in a worthwhile way by sacrificing them with happiness into this sacrificial fire of Rudra. Give everything to the Father at this present time and claim your kingdom for 21 births from the Father. 


Blessing: May you constantly be an embodiment of power (shakti swaroop) and fill weak souls with power through your good wishes. 

The special service of you serviceable children is to remain embodiments of power yourselves and to make everyone an embodiment of power, that is, to fill weak souls with power. For this, always be an embodiment of good wishes and elevated feelings. Good wishes does not mean that you have pure feelings (shubh bhavna) for others such that you become emotional (bhaav vaan). Do not make this mistake. Let your good wishes also be unlimited. To have special feelings for one is damaging. Therefore, have an unlimited stage and, on the basis of the powers you have attained, become an embodiment of power.

Slogan: The ornaments are the decoration (shringaar) of Brahmin life; therefore, be one holding the ornaments (alankaari), not one who has arrogance (ahankaari).

 
***OM SHANTI***


Vices to Virtues: 58: संस्कार परिवर्तन

Vices to Virtues: 58: संस्कार परिवर्तन






Bapdada has told us to cremate our old sanskars. (Sanskar ka sanskar karo) Not just to suppress them, but to completely burn them, so there is no trace or progeny left. Check and change now. Have volcanic yoga ( Jwala swaroop) Let us work on one each day.


बापदादा ने कहा है के ज्वाला  मुखी  अग्नि  स्वरुप  योग  की  शक्ति  से  संस्कारों  का संस्कार करो ; सिर्फ मारना नहींलेकिन  जलाकर नाम रूप ख़त्म कर दो.... चेक और चेन्ज करना ... ज्वाला योग से अवगुण और पुराने संस्कार जला देना ...हररोज़ एक लेंगे और जला देंगे...

पुराने वा अवगुणो का अग्नि संस्कार.... ५८...... किसी की राय को कट करना ड़ीस रिगार्ड करना ...............बदलकर....  मैं आत्मा सर्व  के विचारों को सम्मान  देने वाली, नम्र हूँ, निर्मान हूँ.....

cremate our old sanskars 58.........to disregard opinions of others, to cut them off........ replace them by I, the modest, polite and humble soul, honour everyone’s thoughts and opinions and listen respectfully........

Poorane va avguno ka agni sanskar.... 58....Kisi ki rai ko disregard karna, kut karna......badalkar.... mai atma  sarv ke  vicharon ko samman dene wali, namr hun, nirmaan hun...


पुराने वा अवगुणो का अग्नि संस्कार.... ५८...... किसी की राय को कट करना ड़ीस रिगार्ड करना ...............बदलकर....  मैं आत्मा सर्व  के विचारों को सम्मान  देने वाली नम्र हूँ, निर्मान हूँ.....

मैं आत्मा परमधाम शान्तिधाम शिवालय में हूँ ....... शिवबाबा के साथ हूँ ..... समीप हूँ .... समान हूँ ..... सम्मुख हूँ .....  सेफ हूँ ..... बाप की छत्रछाया में हूँ .....अष्ट इष्ट महान सर्व श्रेष्ठ हूँ ...... मैं आत्मा मास्टर ज्ञानसूर्य हूँ .... मास्टर रचयिता हूँ ..... मास्टर महाकाल हूँ ..... मास्टर सर्व शक्तिवान हूँ ..... शिव शक्ति कमबाइनड  हूँ  ........ अकालतक्खनशीन  हूँ ....अकालमूर्त हूँ ..... अचल अडोल अंगद एकरस एकटिक एकाग्र स्थिरियम अथक और बीजरूप  हूँ ........ शक्तिमूर्त ..... संहारनीमूर्त ...... अलंकारीमूर्त ..... कल्याणीमूर्त हूँ ......शक्ति सेना हूँ ..... शक्तिदल हूँ ...... सर्वशक्तिमान हूँ ......  रुहे गुलाब .... जलतीज्वाला .... ज्वालामुखी ....  ज्वालास्वरूप .... ज्वालाअग्नि हूँ .... किसी की राय को कट करना ड़ीस रिगार्ड करना................अवगुणों का आसुरी संस्कार का अग्नि संस्कार कर रही हूँ ........ जला रही हूँ ...... भस्म कर रही हूँ ......  मैं आत्मा महारथी महावीर ........ किसी की राय को कट करना ड़ीस रिगार्ड करना....................... के  मायावी संस्कार पर विजयी रूहानी सेनानी हूँ .......... मैं आत्मा, सर्व  के विचारों को सम्मान  देने वाली, नम्र हूँ, निर्मान हूँ....    मैं देही -अभिमानी ..... आत्म-अभिमानी..... रूहानी अभिमानी .....परमात्म अभिमानी..... परमात्म ज्ञानी ..... परमात्म भाग्यवान..... सर्वगुण सम्पन्न  ..... सोला  कला सम्पूर्ण ..... सम्पूर्ण निर्विकारी .....मर्यादा पुरुषोत्तम  ...... डबल अहिंसक  हूँ ..... डबल ताजधारी ..... विष्व  का मालिक हूँ ..... मैं आत्मा ताजधारी ..... तख़्तधारी ..... तिलकधारी ..... दिलतक्खनशीन  ..... डबललाइट ..... सूर्यवंशी शूरवीर ....... महाबली महाबलवान ..... बाहुबलि पहलवान ....... अष्ट भुजाधारी अष्ट शक्तिधारी   अस्त्र शस्त्रधारी शिवमई शक्ति हूँ .....

cremate our old sanskars 58.........to disregard opinions of others, to cut them off........ replace them by I, the modest, polite and humble soul, honour everyone’s thoughts and opinions and listen respectfully........

I am a soul...I reside in the Incorporeal world...the land of peace...Shivalaya...I am with the Father...I am close to the Father...I am equal to the Father...I am sitting personally in front of the Father...safe...in the canopy of protection of the Father...I am the eight armed deity...a  special deity...I am great and elevated...I, the soul am the master sun of knowledge...a master creator...master lord of death...master almighty authority... Shivshakti combined...immortal image...seated on an immortal throne...immovable, unshakable Angad, stable in one stage, in a constant stage, with full concentration....steady, tireless and a seed...the embodiment of power...the image of a destroyer...an embodiment of ornaments...the image of a bestower...the Shakti Army...the Shakti  troop...an almighty authority...the spiritual rose...a blaze...a volcano...an embodiment of a blaze...a fiery blaze...I am cremating the sanskar of  disregarding opinions of others, cutting them off.........I am burning them...I am turning them into ashes...I, the soul am a maharathi...a mahavir...I am the victorious spiritual soldier that is conquering the vice of  disregarding opinions of others, cutting them off......... I, the modest, polite and humble soul, honour everyone’s thoughts and opinions and listen respectfully..................I , the soul, am soul conscious, conscious of the soul, spiritually conscious, conscious of the Supreme Soul, have knowledge of the Supreme Soul, am fortunate for knowing the Supreme Soul.....I am full of all virtues, 16 celestial degrees full, completely vice less, the most elevated human being following the code of conduct, doubly non-violent, with double crown...I am the master of the world, seated on a throne, anointed with a tilak, seated on Baba’s heart throne, double light, belonging to the sun dynasty, a valiant warrior, an  extremely powerful and  an extremely strong wrestler with very strong arms...eight arms, eight powers, weapons and armaments, I am the Shakti merged in Shiv...


Poorane va avguno ka agni sanskar.... 58....Kisi ki rai ko disregard karna, kut karna......badalkar.... mai atma  sarv ke  vicharon ko samman dene wali,  namr hun, nirmaan hun...

mai atma paramdham shantidham, shivalay men hun...shivbaba ke saath hun...sameep hun...samaan hun...sammukh hun...safe hun...baap ki chhatra chaaya men hun...asht, isht, mahaan sarv shreshth hun...mai atma master gyan surya hun...master rachyita hun...master mahakaal hun...master sarv shakti vaan hun...shiv shakti combined hun...akaal takht nasheen hun...akaal moort hun...achal adol angad ekras ektik ekagr sthiriom athak aur beej roop hun...shaktimoort hun...sanharinimoort hun...alankarimoort hun...kalyani moort hun...shakti sena hun...shakti dal hun...sarvshaktimaan hun...roohe gulab...jalti jwala...jwala mukhi...jwala swaroop...jwala agni hun... Kisi ki rai ko disregard karna, kut karna.......avguno ka asuri sanskar kar rahi hun...jala rahi hun..bhasm kar rahi hun...mai atma, maharathi mahavir Kisi ki rai ko disregard karna, kut karna................ke mayavi sanskar par vijayi ruhani senani hun...mai atma sarv ke  vicharon ko samman dene wali, namr hun, nirmaan hun.....mai dehi abhimaani...atm abhimaani...ruhani abhimaani...Parmatm abhimaani...parmatm gyaani...parmatm bhagyvaan...sarvagunn sampann...sola kala sampoorn...sampoorn nirvikari...maryada purushottam...double ahinsak hun...double tajdhaari vishv ka malik hun...mai atma taj dhaari...takht dhaari...tilak dhaari...diltakhtnasheen...double light...soorya vanshi shoorvir...mahabali mahabalwaan...bahubali pahalwaan...asht bhujaadhaari...asht shakti dhaari...astr shastr dhaari shivmai shakti hun...


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